
आशी बड़ा परेशान था, कार चलाते चलाते वो अपने दोस्त के बारे में सोचता जा रहा था जिसके साथ उसने अपना बचपन बिताया.. आज उसका दोस्त देश की सबसे बड़ी निर्माण कंपनी में सर्वोच्च पद पर है और वो आज तक छोटे मोटे ठेके ले कर अगले दिन का इंतज़ार करता है. ये अंतर कहाँ से आया, दोनों ने साथ साथ एक ही स्कूल में पढाई करी थी! कार की गति धीमी थी पर आशी का मन कई वर्षों को पल पल में सफ़र कर रहा था. आज आशी की पत्नी ने उसको जिद कर के अपने दोस्त अमित के पास भेजा की वो जा कर अपने लिए उस ठेके की बात करे जिसका विज्ञापन पेपर में निकला है. अगर ये काम आशी को मिल जाता है तो उसके सारी समस्याएँ दूर हो जायेंगी. पर संकोच ये है कि इतने सालों बाद आज अमित से मिलना और वो भी काम से, इस में संकोच लग रहा था.. रह रह कर आशी को कृष्ण सुदामा की कहानी याद आ रही थी और आशी को खुद को सुदामा से तुलना करना ख़राब लग रहा था. खैर अमित का घर आया, दरबान ने बाहर लगी कुर्सियों कि ओर इशारा कर के कहा कि बैठ जाइये, साहब को खबर कर दी है. आशी को वो दिन याद आ गए जब वो अमित के घर बिना घंटी बजाये चला जाया करता था और सोते से अमित को जगा देता था, कुछ ऐसा ही अमित भी करता था. दो छोटे बच्चे दौड़ते हुए आशी के बगल से बगीचे की ओर गए, शायद अमित के बच्चे होंगे. तभी अमित की आवाज़ आई "क्या भाई इतने दिन बाद याद आई मेरी?" और आशी को आ कर गले लगा लिया. आशी को लगा कि वो निश्चित सुदामा ही है! अमित आशी को घर के अन्दर ले गया और अपने बीबी-बच्चों से मिलवाया, सबने शिकायत करी कि शादी के बाद अब मिल रहे हैं. आशी मन ही मन सोच रहा था कि एक दिन साईट पर ना जाओ तो मजदूरों की तनख्वाह भारी पड़ जाती है. नाश्ते के बाद अमित ने पूछा, बताओ यार कैसे याद किया, आशी ने संकोच में कहा कि जो पेपर में विज्ञापन आया था, कालोनी के अर्थ-वर्क का, वो काम अगर उसको मिल सके तो.. अमित ने तत्काल मोबाइल से एक कॉल किया और कहा कि जो ठेका जाना था वो किसी को दिया कि नहीं? अगर दिया भी हो तो रद्द कर दो, मेरा एक दोस्त अभी आएगा उसको सारा काम समझा देना और काम उसको ही मिलना चाहिए. आशी को तो सब सपने जैसा लग रहा था, इतना आसान होगा ये उसने भी नहीं सोचा था. अमित ने कहा अब जल्दी मेरे ऑफिस में कमल साहनी से मिल लो, और जो जो वो बोले वो उसको ला दो, अगले हफ्ते से काम शुरू कर देना. आशी के ना चाहते हुए भी आंसू आ गए & अमित को गले लगा कर बस "थेंक यू" बोल पाया.
कमल साहनी ने आशी को सारे कागज़ बताये, लोकेशन बताई, और कुल ठेके की राशि (3 करोड़) का 10% जमा करने को कहा. आशी की सारी हवा गायब हो गयी, 30 लाख अगर उसके पास होते तो वो इतना परेशान क्यों होता? उसने अमित को फ़ोन किया, और अपनी दिक्कत बताई, अमित बोला, "यार कहीं से भी इन्तेजाम करो, अब काम तुमको ही करना है. इस काम से तुम्हारी ज़िन्दगी बन जायेगी, दूसरे लोग तो ये ठेका दिलाने के लिए 15 -20 लाख देने को तैयार थे, मैंने तो तुमसे कुछ भी नहीं लिया". आशी ने फिर से "थेंक यू" कहा, साहनी जी से भी "थेंक यू" और "सॉरी" कहा, और अपने घर की राह पकड़ी. रास्ते में खुद से हस्ते हुए बोलने लगा - मैं सुदामा हूँ, वो कृष्ण थोड़ी है पगले हाहाहा ..
: प्रियंक ठाकुर :)
thanks for posting this story on your blog :)
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